The below is a deeply intellectual conversation between Prof Shrikant Singh, a noted Buddhist scholar and presently Head, Department of English, Nava Nalanda Mahavihara and Mr Tal Tennee of Israel, a guest at the Hotel Nalanda Guest House, Nalanda. A video of this conversation may also be found on Facebook (check out the official page of the Hotel Nalanda Guest House).
Dated: 13 June 2026
आज सुबह होटल नालंदा गेस्ट हाउस में मेरी मुलाकात एक युवा इज़रायली यात्री, श्री ताल (Mr. Tal), से हुई। वे नाश्ता कर रहे थे। बातचीत आरम्भ हुई तो पता चला कि वे मनोविज्ञान में प्रशिक्षित हैं और पिछले इक्कीस वर्षों से बार-बार भारत आते रहे हैं। भारत के प्रति उनके आकर्षण की गहराई का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया के अनेक देशों की यात्राओं के बावजूद वे बार-बार यहीं लौट आते हैं।
बातों-बातों में हिमालय की चर्चा छिड़ी। श्री ताल ने कहा कि भारत का पर्वतीय क्षेत्र उन्हें विशेष रूप से आकर्षित करता है। हिमालय की सुंदरता का वर्णन करते समय मानो उनके पास शब्द कम पड़ गए। उन्होंने कहा कि उन्होंने यूरोप के प्रसिद्ध Alps को भी देखा है, परन्तु उनके अनुसार हिमालय की बात ही कुछ और है। हिमालय केवल एक पर्वत-श्रृंखला नहीं, बल्कि एक अनुभव है। उसकी विशालता, उसकी निस्तब्धता और उसकी आध्यात्मिक आभा मनुष्य के भीतर तक उतर जाती है। उन्होंने कहा कि हिमालयी घाटियों में एक अद्भुत नैसर्गिक सौंदर्य बिखरा रहता है। वहाँ के पर्वत, वन, नदियाँ और बदलते हुए आकाश के रंग मिलकर ऐसा दृश्य रचते हैं जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है। उन्हें यह भी लगा कि हिमालय क्षेत्र के नगर और कस्बे अपेक्षाकृत अधिक शांत और संतुलित जीवन जीते हैं। वहाँ पहुँचकर व्यक्ति को ऐसा अनुभव होता है मानो वह प्रकृति के अधिक निकट और जीवन के मूल स्वरूप के अधिक समीप आ गया हो।
उन्होंने आगे कहा कि जैसे-जैसे कोई व्यक्ति मैदानी भागों से ऊपर, लगभग एक हजार-दो हजार फुट या उससे अधिक की ऊँचाई की ओर बढ़ता है, वैसे-वैसे उसे लगता है कि वह किसी देवभूमि या प्रकृति के अत्यंत निकट पहुँच रहा है। वहाँ की हवा, वातावरण और लोगों के जीवन में एक अलग ही सरलता और सहजता दिखाई देती है।
उनकी यह बात सुनते ही मेरी स्मृतियों का एक पुराना पृष्ठ खुल गया। अक्सर रविवार की सुबह मैं राजगीर के गृद्धकूट पर्वत पर जाया करता हूँ। वहाँ पहुँचते ही कई बार मुझे ऐसा अनुभव हुआ है मानो मैं पृथ्वी के शोर-शराबे, भीड़-भाड़ और प्रदूषण से निकलकर किसी दूसरे ही लोक में प्रवेश कर गया हूँ। प्रातःकाल की शुद्ध वायु में बैठकर प्राणायाम करना ऐसा लगता है जैसे शरीर और मन दोनों का शोधन हो रहा हो। उसी क्षण मेरे मन में विचार आया कि शायद यही कारण रहा होगा कि प्राचीन काल के अनेक साधक और तपस्वी हिमालय की ओर चले जाते थे। प्रकृति के सान्निध्य में मनुष्य स्वयं को अधिक स्पष्ट रूप से सुन पाता है।
श्री ताल ने एक और रोचक अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि एक बार वे भारत आने के स्थान पर न्यूज़ीलैंड चले गए थे। वहाँ पहुँचकर उन्हें लगा मानो वे यूरोप के ही किसी देश में आ गए हों—भौतिक समृद्धि, आर्थिक सफलता और उपभोक्तावाद की एक अत्यंत विकसित दुनिया। वे मुस्कराते हुए बोले, “कुछ ही दिनों में मुझे लगा कि मैं गलत जगह आ गया हूँ। मैं जल्दी ही वहाँ से निकल आया और भारत लौट आया।”
पश्चिमी समाजों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वहाँ यदि कोई व्यक्ति धन और आर्थिक सफलता को जीवन की पहली प्राथमिकता न बनाए, तो उसे मूर्ख या पागल समझा जा सकता है। भारत की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ भी लोग धन कमाना चाहते हैं, परन्तु अभी भी जीवन को केवल धन के पैमाने पर नहीं मापा जाता। परिवार, संबंध, आध्यात्मिकता और सामुदायिक जीवन जैसे मूल्य अब भी महत्त्व रखते हैं।
इसी संदर्भ में उन्होंने संकेतों में नालंदा के ग्राम्य जीवन की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि बड़े शहरों की चकाचौंध और बाज़ार-केंद्रित जीवन के बीच मनुष्य अक्सर अपना चैन और आंतरिक संतुलन खो देता है, जबकि नालंदा जैसे स्थानों में जीवन अब भी अपेक्षाकृत सरल, सहज और मानवीय दिखाई देता है। यहाँ लोगों के पास एक-दूसरे के लिए समय है, रिश्तों के लिए स्थान है और जीवन को केवल आर्थिक उपलब्धियों से नहीं आँका जाता। कुछ क्षण रुककर उन्होंने कहा, “शायद यही भारत की आत्मा है। हम जैसे लोग उसी आत्मा को देखने और अनुभव करने यहाँ आते हैं।”
भारतीय भोजन की चर्चा छिड़ी तो उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। उन्होंने भारतीय व्यंजनों की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। उनके अनुसार दक्षिण भारत का नाश्ता उन्हें विशेष रूप से पसंद है, जबकि भोजन के मामले में उनकी रुचि उत्तर भारतीय व्यंजनों की ओर अधिक है। हँसते हुए उन्होंने कहा, “यक़ीन मानिए, यहाँ का साधारण-सा आलू पराठा भी कई पाँच सितारा होटलों में परोसे जाने वाले आकर्षक और महँगे पराठों से अधिक स्वादिष्ट लगता है।”
उन्होंने आगे कहा कि भारतीय रसोइये किसी कुशल रसायनविद् की तरह होते हैं, जो मसालों, अनाजों और साधारण सामग्रियों के भीतर छिपे स्वाद को पहचानकर उन्हें इस प्रकार संयोजित करते हैं कि एक नया और चमत्कारिक स्वाद जन्म लेता है। उनके अनुसार भारत में भोजन केवल भोजन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति और आत्मीयता का उत्सव है। उन्होंने स्वीकार किया कि भारतीय व्यंजनों की यह विविधता और समृद्धि भी उन कारणों में से एक है जो उन्हें बार-बार भारत लौटने के लिए प्रेरित करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी दृष्टि में भारत आज भी रहने, घूमने और सीखने के लिए अपेक्षाकृत सुलभ और किफ़ायती देश है। यही कारण है कि वे वर्षों से बार-बार यहाँ आने में समर्थ रहे हैं। उनके लिए भारत केवल एक पर्यटन-स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव है जहाँ हर यात्रा उन्हें कुछ नया सिखाकर लौटाती है।
उनकी यह बात सुनकर मुझे भारत के प्रसिद्ध अंग्रेज़ी लेखक Ruskin Bond का एक संस्मरण याद आ गया। उन्होंने लिखा है कि एक समय अपनी अंग्रेज़ी को और बेहतर बनाने के उद्देश्य से वे अपने रिश्तेदारों के पास इंग्लैंड गए थे। वहाँ उनका पूरा सम्मान हुआ, रिश्तेदारों ने उन्हें भरपूर स्नेह दिया, फिर भी कुछ ही दिनों में उन्हें बेचैनी होने लगी। वे बार-बार सोचने लगे कि ऐसा क्या है जिसे वे भारत में छोड़ आए हैं और जो उन्हें लगातार वापस बुला रहा है।
आत्मचिन्तन के बाद उन्हें लगा कि इंग्लैंड का जीवन अपेक्षाकृत अधिक औपचारिक और आरक्षित है, जबकि भारत का जीवन कहीं अधिक खुला और आत्मीय है। भारत में कोई व्यक्ति बहुत देर तक अजनबी नहीं रहता। थोड़ी-सी बातचीत के बाद लोग अपने सुख-दुःख बाँटने लगते हैं। मित्रों के साथ बैठकर चाय पीना, चबेना या नाश्ता साझा करना, घंटों गपशप करना और बिना किसी विशेष प्रयोजन के एक-दूसरे के साथ समय बिताना—ये छोटी-छोटी बातें भारतीय जीवन की आत्मा हैं। शायद वही आत्मा उन्हें वापस भारत खींच लाई थी।
श्री ताल की बातें सुनते हुए मुझे लगा कि यही अनुभव किसी न किसी रूप में उन्हें भी भारत की ओर बार-बार खींच लाता है।
नालंदा के खंडहरों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें इन्हें देखकर दुःख भी हुआ। कभी विश्व के महानतम ज्ञान-केंद्रों में से एक रहा यह विश्वविद्यालय आज केवल अवशेषों के रूप में हमारे सामने है। परन्तु उसी क्षण उनके मन में एक दूसरा विचार भी आया। उन्होंने कहा कि नालंदा यह सिखाता है कि भौतिक वैभव नष्ट हो सकता है, भवन ढह सकते हैं, संस्थाएँ मिट सकती हैं, परन्तु ज्ञान की शक्ति नष्ट नहीं होती। नालंदा के भवन भले ही न रहे हों, पर उसका ज्ञान भारत की सीमाओं को पार कर एशिया और विश्व के अनेक देशों तक पहुँचा। वह आज भी लोगों को आलोकित कर रहा है। नालंदा इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि बौद्धिक और आध्यात्मिक संपदा भौतिक संपदा से कहीं अधिक स्थायी होती है।
नालंदा की चर्चा के क्रम में उन्होंने एक रोचक प्रश्न पूछा—“इतना महान विश्वविद्यालय यहीं क्यों स्थापित किया गया था?”
मैंने उनसे कहा कि यदि प्राचीन मगध को ज्ञान का एक विशाल उपवन माना जाए, तो नालंदा उस उपवन का सबसे अधिक सुगंधित और सर्वाधिक आलोकित पुष्प था। नालंदा तत्कालीन मगध की राजधानी Rajgir के निकट स्थित था और भगवान Gautama Buddha तथा Mahavira दोनों के जीवन और यात्राओं से इसका गहरा संबंध था। बुद्ध को नालंदा का आम्रवन अत्यंत प्रिय था और उन्होंने यहाँ अनेक बार प्रवास किया तथा उपदेश दिए। इस प्रकार यह भूमि आध्यात्मिक और बौद्धिक साधना की दृष्टि से पहले से ही अत्यंत उर्वर बन चुकी थी।
इसके अतिरिक्त नालंदा उस महत्वपूर्ण मार्ग पर भी स्थित था जो प्राचीन मगध की राजधानी Pataliputra को उत्तर भारत और पूर्वी भारत के अन्य क्षेत्रों से जोड़ता था। ज्ञान, संस्कृति, व्यापार और आध्यात्मिक परम्पराओं का यह संगम नालंदा को एक ऐसे विश्वविद्यालय के रूप में विकसित होने के लिए आदर्श आधार प्रदान करता था जिसकी ख्याति बाद में सम्पूर्ण एशिया में फैल गई।
प्रसंगवश भगवान बुद्ध की चर्चा हुई। उन्होंने पूछा कि क्या बौद्ध धर्म और हिन्दू धर्म के बीच मूलभूत विरोध था। मैंने उन्हें बताया कि बौद्ध धर्म भारतीय ज्ञान-परम्परा से ही निकली एक महत्त्वपूर्ण धारा है। बुद्ध ने भारतीय चिंतन को एक नया आयाम दिया। उन्होंने मनुष्य को यह विश्वास दिलाया कि वह अपने पुरुषार्थ, विवेक और साधना के बल पर अपने जीवन का मार्ग स्वयं निर्मित कर सकता है। इस प्रकार बौद्ध धर्म ने भारतीय ज्ञान-परम्परा को और अधिक समृद्ध बनाया।
बातचीत के अंत में श्री ताल ने मुझसे पूछा कि एक गुणात्मक जीवन कैसा होना चाहिए। मैंने कहा कि हमारे समाज में कभी जीवन का आधार केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं था। लोग एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी होते थे। जिम्मेदारियाँ साझा होती थीं। धन आवश्यक था, परन्तु वह जीवन का स्वामी नहीं, उसका सहायक था।
वे मेरी इस बात से पूरी तरह सहमत दिखाई दिए। पश्चिम की अत्यधिक भौतिकवादी जीवन-दृष्टि के प्रति उन्होंने असहमति व्यक्त की और भारतीय संस्कृति के उन मूल्यों को सम्मान दिया जो मनुष्य को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि सामाजिक, नैतिक और आध्यात्मिक प्राणी के रूप में देखते हैं।
उनसे विदा लेने के बाद मेरे मन में एक विचार देर तक गूँजता रहा। श्री ताल जैसे हजारों विदेशी भारत की तलाश में यहाँ आते हैं। वे यहाँ केवल स्मारक, मंदिर, पर्वत या दर्शनीय स्थल देखने नहीं आते; वे उस भारत की खोज में आते हैं जिसकी आत्मा अभी भी संबंधों, साझेदारी, आध्यात्मिकता, प्रकृति और जीवन के संतुलन में बसती है।
विडम्बना यह है कि कभी-कभी हम भारतीय ही अपने देश की इस आत्मा के साथ रहते हुए भी उससे अपरिचित बने रहते हैं। ऐसे यात्री हमें हमारे ही मूल्य, हमारी ही विरासत और हमारे ही सांस्कृतिक वैभव का स्मरण करा जाते हैं।
शायद यही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है—वह अपने लोगों को ही नहीं, दूर-दूर से आने वाले यात्रियों को भी स्वयं के भीतर झाँकने और जीवन के अर्थ को नए सिरे से समझने की प्रेरणा देता है। यही कारण है कि भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि एक सतत् अनुभव है; और नालंदा जैसे स्थान उस अनुभव की जीवित स्मृतियाँ हैं, जहाँ इतिहास, ज्ञान, प्रकृति और मानवीय आत्मीयता आज भी एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े दिखाई देते हैं।
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